बुधवार, 13 अगस्त 2008

उसकी पायल...


बहोत
रोई थी वो …. स्कूल से आते ही बस्ता फेंक के आज भी पापा के पास जाके पूछा…..” गई मेरी पायल ? “ और पापा ने कहाना….. नही आई….’ आज शायद चौथा दिन था पूछने का ….पापा ने मेरे लिए पायल करवाई थी …. और उसके लिए नही …. नन्ही थी तो उन्हे लगा की खो देगी ….और उसका ये कहना था की मुझे तो चलने पर बस आवाज़ होनी चाहिए…..छन छन …. और वो भी जोरो से….. पूरी दुनिया को पता चले की मैं रही हू …. ऐसे ….मुझे बस पायल चाहिए….घूंघुरू वाली….. दीदी को दिलाई तो मुझे भी चाहिए…..वैसे मेरी पायल में मैने घुंघरू नही डलवाए थे…..बेचारी साइलेंट थी …..

पापा
के मुँह से ना सुनते ही वो जोरो से रो पड़ी….रूम के बीचो बीचस्कूल ड्रेस में…..पैर पटकती हुए….मैं घर पर ही थी…..उसे देख के हसी रही थी…. उसका चहेरा….लाल हो रहा था….और घुंघरू के बजाए उसके रोने की आवाज़ रही थीज़ोर ज़ोर से….. दुनिया को सच में पता चल रहा था…:) की वो गई है



कुछ
साल बीत गयेउस दिन तो पापा ने उसे पुरानी गुड़िया के साथ उसका फोटो लेकर उसे म्ना लिया था….. और अब उसकी शादी होने वाली थी…. गहनो की बात हो रही थी….. उसके ससुराल से बड़े बड़े पायल आए थे…….और वो कहती थी….अब मैं नही पहेनूँगी…..अब उसे गुड़िया भी नही चाहिए थी…..एक जीते जागते अच्छे इंसान ने उसे पसंद कर लिया था……और अब वो खुद किसी की प्यारी सी गुड़िया जैसी थी….. घूंघुरू की छन छन के बजाए उसे मोबाइल में सेट उसकी रिंगर ID पसंद थी…॥



कैसे
करवट लेती है जिंदगी …. उस दिन मैं उसकी नादानीयत पर हंस पड़ी थी ….आज उसको खुश देखके मुस्कुरा देती हू……

16 टिप्पणियाँ:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

कितनी प्यारी बात को इतनी खूबसूरती से लिखा है आपने.. सच में नेस्बी इतनी ही प्यारी और चंचल होती है..

शोभा ने कहा…

हाँ सही बात है। जीवन में प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। सुन्दर रूप में भाव व्यक्त किए हैं आपने। सस्नेह

पंगेबाज ने कहा…

कुश जी पहले इस 'tikkakabab'को यानी वर्ड वरिफ़िकेशन को हटाईये .

Nitish Raj ने कहा…

really a nice presentation, a good one start...keep going with that 'mushkaan' nasbee....congrats.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

यूँ ही बदल जाता है सब कुछ ..बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने इस को

Saee_K ने कहा…

bahut hi pyaari post...
bachpan ke vakiye yaad dilaa diye..:)

badhiya shuruaat ke liye badhai

likhte rahe..

'ताइर' ने कहा…

waqt ke siva sabki aadat badalti hain...par dil nahin samaj paata...

umda likha hai aap ne...

Lavanyam - Antarman ने कहा…

अरे ...
ये पायल की कहानी
और छवि
दोनोँ ही मनभावन हैँ
-लावण्या

अनुराग ने कहा…

यही जीवन है न भागता दौड़ता....लड़किया सचमुच जल्दी बड़ी हो जाती है ना ?

Udan Tashtari ने कहा…

वक्त भागता है. जिन्दगी के मायने बदल जाते हैं. नेस्बी के माध्यम से आपने यथार्थ को बहुत ही खूबसूरती की साथ उकेरा है.

बहुत ही सार्थक प्रयास है. इसे जारी रखें. मेरी अनन्त शुभकामनाऐं आपके साथ हैं.

मीनाक्षी ने कहा…

नेस्बी का बहुत प्यारा रूप दिखने को मिला...जैसे झर झर करता झरना धरती पर आते ही शांत नदी की धारा का रूप ले लेता है.. ज़िन्दगी भी इसी तरह अपना रूप बदलती है... शुभकामनाएँ ..

Amit K. Sagar ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत. मुबारक हो. शुभकामनाएं.
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rajiv ने कहा…

नेस्बी, एक खुशनुमा एहसास
आइए आज ऐसे ब्लॉग की बात करें जहां न तो ब्लागर का बखानों से भरा प्रोफाइल है, ना दंभ, ना आडम्बर और ना अनावश्यक बौद्धिकता. ये ब्लाग धीरे धीरे बहती निर्मल शांत नदी की तरह है जिसके किनारे की बयार में कहीं रात की रानी की महक है तो कहीं वनचम्पा की खुशबू. चलते हैं नेस्बी के किनारे. नेस्बी यानी सृजनशीलता का ऐसा दरिया जो आपको ताजगी का अहसास कराता है, संघर्ष के लिए प्र्रेरित करता है और पॉजिटिवटी से भर देता है. यह ब्लॉग महिलाओं के सम्मान, उनके अधिकार, उनकी संवेदनाओं, उनके वजूद की दास्तान है. यह ब्लॉग हर उस महिला के लिए है जिसे नारी होने पर गर्व है.
सही मायने में नेस्बी जिंदगी का एक ऐसा कैनवास है जिसमें आपनी अपनी पसंद के रंगों को भर सकते हैं. इसमें जिंदगी में उतार-चढ़ाव के इंद्रधनुषी रंग हैं.
इसमें पारुल की नानी मधुरा के रूप में उनकी नेस्बी के संघर्ष, अस्मिता और जीवन दर्शन का सारांश है तो मीता सोनी की पोस्ट 'उसकी शादीÓ में ऐसे संस्मरण हैंं जिसमें दहेज के दंश को झेलती नारी की टीस है तो मेल डॉमिनेटेड सोयायटी में पुरुष की लाचारी पर तीखा कटाक्ष भी. उन्नति शर्मा ने 'स्त्रियोचितÓ शीर्षक से अपनी पोस्ट में स्त्री होने के मायने और संबंधों की आर्टिफिशियलिटी पर सवाल उठाए हैं. नेस्बी में सिद्धहस्त लेखिकाओं के बीच श्रद्धा जैन जैसी डिब्यूटेंट ब्लॉगर भी हैं जिन्होंने 'हां, मैं पास हो गईÓ षीर्षक से अपनी पहली पोस्ट लिखी है. इसमें बाल मनोविज्ञान को समझने में एक महिला, एक टीचर की सेंसिटिविटी को इतने सहज और सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि लगता ही नहीं कि यह उनकी पहली रचना है.
इसके बाद की दो ब्लॉगर भी डिब्यूटेंट हैं. एक हैं पल्लवी त्रिवेदी और दूसरी हैं सई करोगल. पल्लवी मध्य प्रदेश पुलिस सेवा की अधिकारी हैं. सेल्फांफिडेंस और डिटरमिनेशन की मिसाल. पुलिस सर्विस की सपाट सख्त और कड़वी सच्चाइयों के बीच गजब का सेंस आफ ह्यूमर. उनके ब्लॉग 'कुछ अहसासÓ में उनकी पोस्ट 'साहब... एक शेर पकड़ा है वो भी गूंगा बहराÓ में इसे महसूस किया जा सकता है. सई करोगल की पोस्ट में जिंदगी के उतार-चढ़ाव और संघर्षों के बीच गजब की पाजिटिविटी है. इसी तरह मीता की पोस्ट में डॉल से दुुल्हन बनती नारी की खूबसूरत सी कहानी है. तो आइये संडे की सुबह http://nesbee.blogspot.com/ पर नेस्बी के साथ शुरू करें. दिन की इससे बेहतर शुरूआत और क्या हो सकती है.
- राजीव ओझा
Also see http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=6/14/2009&editioncode=2&pageno=18

 

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